Janmashtami, story of hope in the darkness

Janmashtami, story of hope in the darkness

The Blue God – Ray Of Hope

Janmashtami is being celebrated to mark the birth of Lord Krishna. He took birth inside a prison cell, in a dark night after 7 of his siblings were murdered. So, he represents the ray of hope in the prison of darkness. When everything falls apart, we surrender ourselves to him. But sometimes, our love for the blue God let us behave in a different way. We hold him responsible for all the miseries of our life.

Here is a short poem depicting the pain of a lady who goes through difficult circumstances.

कठोर कान्हा

न तुम्हे राधा की रुदन सुनाई दी,
न तुम्हे यशोदा की ममता का ध्यान रहा,
दुनिया को अच्छा-बुरा का ज्ञान देते देते,
कदाचित तुम्हे अपनो के कष्ट का न ध्यान रहा।
गांधारी-श्राप के तुम निश्चित ही योग्य थे,
कृतवर्मा के आरोप में भी कुछ सत्यता होगी।
तुम भगवान होते तो जीवन मे मेरे यह कष्ट न होते,
तुम्हारे अस्तित्व को मानना संभवतः मेरी ही भूल होगी।

पूछा केशव ने मंद मंद मुसकाये,
यह क्रोध, यह द्वेष, कितना और कबतक?

बिना इक क्षण विलंब के उत्तर दिया,
जीवन के अंतिम समय तक।
द्वेष इतना के तुम आकलन नही कर सकते,
क्रोध इतना के में व्यक्त नहीं कर सकती।
पत्थर के मूरत में बसाया था,
निश्चित ही हॄदय भी पत्थर का होगा।

माधव सहस्र बोले, तुम ही हो मेरी सच्ची चाहनेबाली।
मै मूरख उन्हें देखती रही,
उनके शब्दों को तोलती रही।

फिर बोले गोविंद, दुनिया में दो ही भाव सच्चे,
एक निष्कपट प्रेम, और एक निर्दोष द्वेष।
जैसे राधा का अविरल प्रेम,
जैसे माता गांधारी का कटु वचन,
जैसे दाऊ बलराम का मन,
जैसे विदुर का समूर्ण समर्पण।

बाकी दुनिया भ्रम में व्यथित है,
सांसारिक रीतियों में स्वयं भ्रमित है।
मुझे तुम वीधियों के बंधन से न बांध पाओगे,
न ही मूरत के सुंदरता में बसा पाओगे।
मैं प्यासा हूँ प्रेम का, विश्वास का,
मुझे बाँधलो तुम मित्र के बंधन में, रिश्तों के धागों में।

फिर एक आलिंगन से हरी ने सारे दुख मेरे हरलिये,
मेरी आँखें अश्रुलिप्त, किंतु हृदय में शांति-करुणा भरदिये।

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